22 Dec 2009
आंखों में रोशनी नहीं, पढ़ा रहे गणितविभा रानी, सीतामढ़ी : कल्पना कीजिए, आपके सामने बैठा एक अंधा इंसान भौतिकी और गणित के जटिल सवालों का धड़ाधड़ दे रहा हो जवाब। आपके हाथ में हो किसी नामचीन भौतिकी वैज्ञानिक की किताब और किसी भी अध्याय के बारे में पूछने पर पृष्ठ संख्या सहित बता दे जवाब, तो है न हैरत वाली बात? सीतामढ़ी जिले में एक ऐसे ही शिक्षक हैं- केसी चौधरी। चौधरी डुमरा स्थित इंटरस्तरीय स्कूल में भौतिकी पढ़ाते हैं। कृष्णानगर डुमरा के रहने वाले हैं। शिक्षा के प्रति पूरी तरह समर्पित। विकलांगों के लिए स्कूल खोलने का सपना भी देख रहे हैं। वह बच्चों को इस तरह पढ़ाते हैं जैसे साक्षात सरस्वती अवतरित हो गई हों। अनुभव इतना गहरा कि पूरा पाठयक्रम याद है। पहले दिन स्कूल आने वाले बच्चों के बीच श्री चौधरी आश्चर्य का कारण बनते रहे हैं, पर आगे चलकर बच्चे इन पर लट्टू हो जाते हैं। गणित और भौतिकी के फार्मूले जुबान पर रहते हैं। चौधरी मूल रूप से पुपरी प्रखंड केभिट्ठा धर्मपुर गांव के रहने वाले हैं। इनके पिता स्व. रामनंदन चौधरी भी शिक्षक थे। एक भाई रामचंद्र चौधरी पुपरी में हाईस्कूल के शिक्षक हैं। 26 सितंबर 1959 को पैदा हुए चौधरी ने मैट्रिक पुपरी के एलएम हाईस्कूल से किया। इंटर व स्नातक श्री राधा कृष्ण गोयनका कालेज से तथा एमएससी फिजिक्स बिहार यूनिवर्सिटी से की। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही उनके आंखों में परेशानी होने लगी। किताबों के बीच ज्यादा ध्यान लगाने से आंखों की रोशनी चली गई। काफी इलाज कराया। एम्स तक गए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आंखों में ग्लुकोमा नामक रोग हो गया और वह अंधी जिंदगी जीने को मजबूर हो गए। वर्ष 1984 से अंधेरी जिंदगी जी रहे हैं। इसके बाद ब्रेल लिपि की ओर कदम बढ़ाया। एक साल के प्रशिक्षण के लिए नेशनल इंस्टीच्यूट फार विजन देहरादून गए। इसी दौरान अप्रैल 1989 में उन्हें सीतामढ़ी इंटर स्कूल डुमरा में नियुक्ति के लिए बुलावा आया। उन्होंने प्रशिक्षण छोड़कर नौकरी कर ली। बीस वर्षो से वह इसी स्कूल में नियमित रूप से कार्यरत हैं। पत्नी कुशल गृहिणी हैं। एक पुत्र निशांत देहरादून में कानून की पढ़ाई कर रहा है। वहीं पुत्री सुगंधा बीएससी की पढ़ाई कर रही है। घर में ब्रेल लिपि के उपकरण भी हैं। रेडियो सुनने की आदत है। शिक्षा ज्ञान के लिए आडियो-सीडी भी सुनते हैं। ब्रेल लिपि के मैग्जीन उनके पास आते रहते हैं। हां, अखबार में छपी खबरों को जानने के लिए दूसरों की मदद जरूर लेते हैं। एक रिक्शाचालक उन्हें रोजाना घर से स्कूल पहुंचाता-लाता है। वर्ष 1998 में उन्होंने विकलांग विकास संस्थान की स्थापना की। इसके बाद बिहार शिक्षा परियोजना की मदद से विकलांगों को शिक्षित करने की मुहिम में जुट गये। शुरुआती दिनों में तो सबकुछ ठीक रहा, लेकिन बाद में मदद नहीं मिलने से मुहिम प्रभावित हो गया। वे चाहते हैं कि कोई जमीन दान करें ताकि अंधों के लिए स्कूल खोल सकें। इसके लिए वे राघोपुर व राजधानी पटना में सीएम के जनता दरबार में कई बार गुहार लगा चुके हैं। उनकी मानें तो जिले में फिलहाल 400 से अधिक नेत्रहीन बच्चे हैं। इनकी पहल पर मंत्री देवेश चंद ठाकुर व पूर्व मंत्री डा. रामचंद्र पूर्वे करीब सौ नेत्रहीन बच्चों को रेडियो सेट उपलब्ध करा चुके हैं। यही नहीं डा. पूर्वे की पहल पर ही इनके संगठन का निबंधन भी हुआ। आंखों में रोशनी..
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